निज मुट्ठी में रोशनी लाया

निज मुट्ठी में रोशनी लाया

चारों तरफ था तिमिर
चल रही थी आँधियां
शांय शांय का शोर था
वो ले रही थी सिसकियां

रास्ते सब वीरान थे
बन्द थी वो खिड़कियां
राज था शैतान का
रो रही थी बच्चियां

जानवर जो बेजान थे
गिद्ध खाये हड्डियां
चमन सारे शमशान थे
जल रही थी लकड़ियां

त्राहि त्राहि कर रहे
आम सारे लोग जब
ले के सूरज हाथ में
आप का उदय हुआ

कष्ट सारे अब मिटेंगे
मन में ये विश्वास था
अब सारे दिन फिरेंगे
सब के मन मे आस था

ले के झाड़ू हाथ में
साफ सब कचरा किया
लग रहा था आप में
भविष्य का उदय हुआ

चूहे सारे कल तलक
जो खा रहे गोदाम थे
आज पकड़े जाएंगे
अब नही बच पाएंगे

टोपियों के जाल में
आस सब बंधी रही
चूहों से संधि हुई
जनता फिर बंदी हुई

उठ गया भरोसा सब
कौन कष्ट मिटाएगा
फिर से कोई सूरज ले के
क्या मेरे घर आएगा

मन बहुत क्लान्त था
फिर भी बिल्कुल शांत था
क्या करूँ क्या ना करूँ
किस पर फिर विश्वास करूँ

तभी पास में आकर के
जुगनू धीरे से ये बोला
खुद की आग जलाकर ही
कर सकता है तूँ उजियाला

जुगनू में मित्र नज़र आया
अब समाधान समझ आया
मेहनत की भट्टी में तपकर
निज मुट्ठी में रोशनी लाया

पंकज कुमार झा
चित्तौड़गढ़

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